Friday, 8 March 2019

तुम्हारी मौत को कैसे रोकें-How to stop your death

तो हम ज्ञान की खोज मे हैं, लेकिन इतनी सारी चीजें हमारे लिए अज्ञात है । इसलिए सनातन गोस्वामी हमें सिखा रहे हैं अपने व्यावहारिक व्यवहार से आध्यात्मिक गुरु के अाश्रय में जाना, और अपना पक्ष रखते हैं कि "मैं इस तरह से पीड़ित हूँ ।" वे मंत्री थे, दुख का कोई सवाल ही नहीं था । वह बहुत अच्छी तरह से स्थित थे । वह उन्होंने पहले से ही समझाया है, कि ग्राम्य-व्यवहारे पंडित। ताई सत्य करी मानि । "तो कई सवाल हैं जिसका मैं जवाब नहीं दे सकता । कोई समाधान नहीं है । फिर भी, लोगों का कहना है कि मैं बहुत पंडित आदमी हूँ -मैं मूर्खता से इसे स्वीकार करता हूँ ।" कोई भी पंडित नहीं है जब तक कि वह गुरु की अाश्रय नहीं लेता है । तद-विज्ञानार्थम स गुरुम एवाभीगच्छेत (मुंडक उपनिषद १.२.१२) |

इसलिए वैदिक आज्ञा यह है कि अगर तुम पंडित बनना चाहते हो, तो गुरु के पास जाअो, प्रामाणिक गुरू, तथाकथित गुरु नहीं ।

तद विद्धि प्रणिपातेन
परिप्रश्नेन सेवया
उपदेक्ष्यन्ति ते
ज्ञानम ज्ञानिनस तत्व-दर्शिन:
(भ.गी. ४.३४)
गुरु का मतलब है जिसने निरपेक्ष सत्य को देखा है । यही गुरु है । तत्त्व-दर्शिन:, तत्त्व का मतलब है निरपेक्ष सत्य, और दर्शिन: जिसने देखा है । तो यह आंदोलन, हमारा कृष्ण भावनामृत आंदोलन, इस उद्देश्य के लिए है, सम्पूर्ण सत्य को देखने के लिए, निरपेक्ष सत्य को समझने के लिए, जीवन की समस्याओं का पता करने के लिए, और उनका कैसे समाधान करें । ये बातें हमारा विषय हैं । हमारा विषय भौतिक बातें नहीं है, कि किसी भी तरह से तुम एक गाडी पाअो और एक अच्छा मकान और एक अच्छी पत्नी, तो तुम्हारे सभी समस्याओं का हल हो जाएगा । नहीं । यह समस्याओं का समाधान नहीं है । असली समस्या यह है कि तुम्हारी मौत को कैसे रोकें । यही असली समस्या है । लेकिन क्योंकि यह बहुत कठिन विषय है, कोई भी इसे छूता नहीं है । "ओह, मौत - हम चैन से मर जाएँगे ।" लेकिन कोई भी शांति से मरता नहीं है । अगर मैं एक चाकू लेता हूँ और मैं कहता हूँ, "अब शांति से मर जाअो," (हंसी) पूरा शांतिपूर्ण हालत तुरंत खत्म हो जाएगी । वह रोएगा ।

तो ये बकवास है, अगर कोई कहता है, "मैं शांति से मर जाऊँगा । ", कोई भी शांति से नहीं मरता है । यह संभव नहीं है । इसलिए मृत्यु एक समस्या है । जन्म भी एक समस्या है । कोई भी मां की कोख के भीतर शांतिपूर्ण नहीं है । वह तंग हालत है, वायुरोधी हालत और आजकल मारे जाने का खतरा भी है । तो शांति का कोई सवाल नहीं है, जन्म और मृत्यु । और फिर बुढ़ापा । जैसे कि मैं बूढ़ा आदमी हूँ, तो कई परेशानियों मुझे है । तो बुढ़ापा । और रोग, हर किसी को अनुभव है, सिर दर्द भी बहुत है तुम्हे तकलीफ देने के लिए । असली समस्या यह है : जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और बीमारी । यही कृष्ण द्वारा दिया गया बयान है, कि जन्म-मृत्यु-जरा-व्याधि दुक्ख-दोशानुदर्शनम (भ.गी. १३.९) | अगर तुम बुद्धिमान हो तो तुम्हे जीवन की इन चार समस्याओं को बहुत ही गंभीरता से लेना चाहिए ।

इसलिए उन्हे ज्ञान नहीं है, इसलिए वे इन सवालों से बचते हैं । लेकिन हमें बहुत गंभीरता से इन सवालों को लेना चाहिए । यही अन्य आंदोलन और कृष्ण भावनामृत आंदोलन के बीच का अंतर है । हमारा आंदोलन है इन समस्याओं का हल कैसे निकाले ।

Saturday, 9 February 2019

Sri Jagannath Rathyatra" Today 10th Feb 2019 Sunday at Kamothe





Following is the schedule:

3:30 pm- Rathayatra starts from Kalimata ground, Vista corner Sec-19, Kamothe.
6:30 pm- Rathyatra arrives on same ground
6:30 pm- Bhajan & Kirtan at Pandal
7:00 pm- Drama and Dance performances
8:00 pm - Pravachan by His Grace Surdas Prabhuji
8:45 pm- Sri Jagannath Arti
9:00 pm -Dinner Prassad for All🌹✨🙏🙏🙏

Srila Prabhupada said, “If you participate in these car festivals, as stated in the scriptures,
Rathe ca vanam drstva punar janma na vidyate”. If you kindly see these Jagannatha deities riding on this cart then in your next life you’ll go back, back to Godhead.”

📞For Annadaan and other details pls call:
Jaisacinandan Das: 9922400424
Krishna Parmeshwar Prabhu: 9820901598



आप अपने मूल स्वरुप को जाने


एक शेर का बच्चा जगंल में भेड़ के बच्चे के भीड़ में मिल गया और फिर वही वह बड़ा हुआ तो उसका रहन-सहन भी भेड़ के जैसे ही हो गया।
फिर एक दिन भेड़ के भीड़ में एक शेर ने दूसरे शेर को देखा तो चकित हुआ कि ऐसे कैसे हो सकता है❓
फिर जब उसने दहाड़ मारी तो सारे भेड़ भागने लगे साथ मे वह शेर भी जो बचपन मे मिल गया था। तब दूसरे शेर ने उसे घेर लिया और फिर उसे एक तालाब के पास ले गया और फिर उसे उसकी तस्वीर दिखाई तो भेड़ वाला शेर देखा की उसका चेहरा ओर जो शेर उसे लेकर आया उसका चेहरा मिल रहा है। फिर उसी तरह दहाड़ना सीखा।
  आज मानव अपने मूल स्वरूप को भूलकर जानवरो जैसे जीवन जीता है बस वही खाया-पिया, बच्चे जन्म देना,रोना-धोना आदि। हमारे देवता भी मानव तन की प्राप्ति के लिए लालायित रहते है किसलिए ताकि वे भी जानवरो जैसे जीवन जिए❓🙏🏻
 नही। बल्कि मानव ही एक ऐसा योनि है जो भटकती हई आत्मा के लक्ष्य को प्राप्त करने में मदद कर सकती है। लेकिन अज्ञानी मानव बस भोग-विलास में जीकर अपने मूल स्वरूप को ही नही जान सकता है।
जैसे-- एक शेर ने जब देखा कि एक दूसरा शेर भेड़ के साथ भेड़ जैसी जिंदगी जी रहा है तो उसने उसके स्वरूप से परिचित करवा दिया। उसी तरह-- जब तत्ववेत्ता संसार में आते है तो वे अज्ञान में जी रहे मानव को देखते है तो मानव को मानव के स्वरूप से परिचित करवाते है तभी मानव कहलाने के काबिल होते है। तभी तो हमारे वेदों में कहा गया है-- मनुर्भव: मनुर्भवः--- अर्थात मनुष्य बनो! मनुष्य बनो।
   मानव का शरीर मिला है इसका मतलब ये नही की मानव के गुण प्रकट हो गए है। मानव बनने के लिए पहले ब्रह्मनिष्ठ तत्ववेत्ता की शरण में जाए। जो आपके मूल स्वरूप ईश्वर का दर्शन करवा कर आपके शक्ति का परिचय देंगे जिससे आप अपने लक्ष्य को प्राप्त कर पाएंगे।
🕉-- क्या आपको ऐसे ब्रह्मनिष्ठ तत्ववेत्ता मिले जो आपके भीतर ईश्वर का दर्शन करवा दिए हो तत्क्षण❓ 
मूलस्वरूप परमात्मा का दर्शन करने के बाद ही पता चलेगा। 🚩🙏🏻
अब आप कैसे जीवन जीना चाहते है भोग-विलास जानवरो की तरह या ब्रह्मनिष्ठ तत्ववेत्ता की शरण मे जाकर स्वयं को जानकर अपना लक्ष्य को पाने की। निर्णय आपका अपना क्योंकि जीवन आपका है

Thursday, 7 February 2019

गोवेर्धनजी पर्वत की परिक्रमा क्यों ?



 गोवेर्धनजी पर्वत की परिक्रमा क्यों ?

श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को  "भगवान का रूप"  बताया और देवराज इन्द्र के स्थान पर उनकी पूजा करने के लिये सभी को प्रेरित किया था ।

आज भी गोवर्धन पर्वत चमत्कारी है और वहां जाने वाले हर व्यक्ति की सभी इच्छायें  परिपूर्ण होती हैं । गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करने वाले हर व्यक्ति को जीवन में कभी भी पैसों की कमी नहीं होती है ।

एक कथा के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने अवतार लेने के पूर्व राधाजी से भी साथ चलने का निवेदन किया । इस पर राधाजी ने कहा कि मेरा मन पृथ्वी पर  "वृंदावन" , "यमुना"  और  "गोवर्धन पर्वत"  के बिना नहीं लगेगा । यह सुनकर श्रीकृष्ण ने अपने हृदय की ओर दृष्टि डाली जिससे एक तेज निकल कर रास भूमि पर जा गिरा। यही तेज पर्वत के रूप में परिवर्तित हो गया । शास्त्रों के अनुसार यह पर्वत रत्नमय, झरनों, कदम्ब आदि वृक्षों से भरा हुआ था एवं कई अन्य सामग्री भी इसमें उपलब्ध थी । इसे देखकर राधाजी प्रसन्न हुई तथा श्रीकृष्ण के साथ उन्होंने भी पृथ्वी पर अवतार धारण किया ।

हम श्रीगिरिराजजी की परिक्रमा क्यों करते हैं ? अज्ञानता अथवा अनभिज्ञता से किया हुआ अलौकिक कार्य भी सुन्दर फल का ही दाता है , तो यदि उसका स्वरूप एवं भाव समझकर हम कोई अलौकिक कार्य करें तो उसका बाह्याभ्यान्तर फल कितना सुन्दर होगा , यह विचारणीय है ।

परिक्रमा का भाव समझिये । हम जिसकी परिक्रमा कर रहें हों , उसके चारों ओर घूमते हैं । जब किसी वस्तु पर मन को केन्द्रित करना होता है तो उसे मध्य में रखा जाता है, वही केन्द्र बिन्दु होता है । अर्थात् जब हम श्रीगिरिराजजी की परिक्रमा करते हैं तो हम उन्हें मध्य में रखकर यह बताते हैं कि हमारे ध्यान का पूरा केन्द्र आप ही हैं और हमारे चित्त की वृत्ति आप में ही है और सदा रहे । दूसरा भावात्मक पक्ष यह भी है कि जब हम किसी से प्रेम करते हैं तो उसके चारों ओर घूमना हमें अच्छा लगता है, सुखकारी लगता है ।

श्रीगिरिराजजी के चारों ओर घूमकर हम उनके प्रति अपने प्रेम और समर्पण का  प्रदर्शन करते हैं । परिक्रमा का एक कारण यह भी है कि श्रीगिरिराजजी के चारों ओर सभी स्थलों पर श्रीठाकुरजी ने अनेक लीलायें की हैं जिनका भ्रमण करने से हमें उनकी लीलाओं का अनुसंधान रहता है ।

परिक्रमा के चार मुख्य नियम होते हैं जिनका पालन करने से परिक्रमा अधिक फलकारी बनती है ।

“मुखे भग्वन्नामः ,
हृदि भगवद्रूपम् ,
हस्तौ अगलितं फलम् ,
नवमासगर्भवतीवत् चलनम्” ।।

अर्थात्  मुख में सतत् भगवत्-नाम, हृदय में प्रभु के स्वरूप का ही चिंतन, दोनों हाथों में प्रभु को समर्पित करने योग्य ताजा फल और नौ मास का गर्भ धारण किये हुई स्त्री जैसी चाल, ताकि अधिक से अधिक समय हम प्रभु की टहल और चिंतन में व्यतीत कर सकें ।

श्रीगिरिराजजी पाँच स्वरूप से हमें अनुभव करा सकते हैं, दर्शन देते हैं। पर्वत रूप में, सफेद सर्प के रूप में, सात बरस के ग्वाल/बालक के रूप में, गाय के रूप में और सिंह के रूप में ।

श्रीगिरिराजजी का ऐसा सुन्दर और अद्भुत स्वरूप है कि इसे जानने के बाद कौन यह नहीं गाना चाहेगा कि “गोवर्धन की रहिये तरहटी श्री गोवर्धन की रहिये…”।

श्री श्रीनाथजी व् श्री गिरिराज जी दोनों एक ही हैं ।

ठाकुर हृदयकी आवाज़ सुनते हैं, प्रेम से आवाज़ दो तो ठाकुर दौड़े चले आयेंगें।



ठाकुर हृदयकी आवाज़ सुनते हैं, प्रेम से आवाज़ दो तो ठाकुर दौड़े चले आयेंगें।

माया भगवान की पहरेदार है जो भगवान से मिलने नहीं देती, जैसे विश्वासपात्र सेविका किसी मेहमान के आने पर वह सबसे पहले दौड़कर आती है और किसी अंजान व्यक्ति को अपने घरवालों से मिलने नहीं देती| इसी प्रकार माया भी भगवान से मिलने में बाधक है

परंतु यदि हम भगवान को सच्चे मन से पुकारें तो भगवान स्वयं ही इस माया रूपी पहरेदार को हमारे और अपने बीच से हटा देंगे | 

“ठाकुर हृदयकी आवाज़ सुनते हैं, प्रेम से आवाज़ दो तो ठाकुर दौड़े चले आयेंगें।”

हमको अपनी सम्पूर्ण शक्ति से हर पल, हर जगह  भगवान का श्रवण, कीर्तन और स्मरण करना  चाहिये।

तृतीय श्लोक में भगवान ने ब्रह्माजी को “जगत सत्ता” (तत्व) के बारे में बताया| भगवान् ही स्वयं इस जगत (संसार) के रूप में विद्यमान हैं। भगवान से अलग जगत का कोई अस्तित्त्व है ही नहीं।

“भगवान की सत्ता (अस्तित्व) से ही जगत की सत्ता का (अस्तित्व) है”

संसार परिवर्तनशील रास्ता है | जिसके द्वारा जगत (संसार ) में लोग आते - जाते रहते हैं, परंतु जगत (संसार) ज्यों का त्यों रहता है|

हमारे पिता, हमारे दादा, परदादा उनके पिता इत्यादि इस रास्ते रूपी संसार से आकर चले भी गये और हम भी चले जायेंगे। लेकिन ये संसार ऐसे का ऐसा ही है।

चतुर्थ श्लोक में भगवान ने “भगवत् प्राप्ति का साधन” बताया। भगवान ने समझाया कि

आत्मतत्त्व को जानने की इच्छा रखने वाले के लिए इतना ही जानने योग्य है की अन्वय (सृष्टि) अथवा व्यतिरेक (प्रलय) क्रम में जो तत्त्व सर्वत्र एवं सर्वदा रहता है, वही आत्मतत्त्व है |

इन चार श्लोकों – “आत्मा, माया, जगत और भगवान को प्राप्त करने की विधि” से पता चलता है कि यह संसार ब्रह्ममय है अर्थात भगवान के अलावा यहां कुछ भी नही है|

तात्विक दृष्टि से जगत मिथ्या है| अतः जगत का विचार अधिक नहीं किया गया है परंतु  सृष्टि के कर्ता का विचार बार–बार किया गया है|

ब्रह्माजी की समझ में आ गया कि हम भगवान के ही अंश हैं| मेरे अन्दर तो आत्मा के रूप में भगवान स्वयं बैठे हैं| जब मैं हूं ही नहीं तो मुझे अपने होने का अहंकार भी नहीं हो सकता| सब ब्रह्ममय है।

हरे कृष्ण!

Wednesday, 6 February 2019

भगवान कौन हैं ?




१. भगवान कौन हैं ?
भगवान हैं केवल श्री कृष्ण जो साकार हैं | वे समस्त कारणों के अन्तिम कारण हैं और न तो कोई उनके समान है और न ही उनसे बड़ा | ईश्वर: परम: कृष्ण: सच्चिदानन्द: विग्रह:, अनादिरादि  गोविन्द: सर्व कारण कारणम: |

२. मैं कौन हूँ तथा मेरा और भगवान का क्या सम्बन्ध है ?
मै आत्मा हूँ, यह शरीर नहीं हूँ बल्कि भगवान का शाश्वत अंश व नित्य दास हूँ | भगवान हमारे अंतरंग स्वामी, मित्र, पिता, या पुत्र तथा माधुर्य प्रेम के लक्ष्य है |

३. मैं इस जगत में क्यूँ हूँ ?
मैं श्री कृष्ण से अपना सनातन सम्बन्ध भूल गया हूँ | मैं स्वामी व भोक्ता बन कर इस भौतिक जगत का भोग करना चाहता हूँ, इसलिए इस भौतिक जगत में अपने कर्मों व उनके फल अनुसार देहान्तर करता रहता हूँ |

४. मैं इस शरीर में क्यूँ हूँ और कष्ट क्यों भोग रहा हूँ ? मै तीन प्रकार के संतापो (आध्यात्मिक, अधिभौतिक व अधिदेविक) को भोगने के लिए क्यों बाध्य किया जाता हूँ ?
अपने पूर्व जन्मो में किये गए कार्यो व अतृप्त इच्छाओं की पूर्ति के कारण मुझे ये शरीर प्रदान किया गया है | मैं अपने आप को शरीर, इसकी उपाधियों, इसके संबंधियों तथा इस संसार में आसक्ति के कारण इन्द्रियतृप्ति में लगा हूँ | मैंने भगवान के साथ अपने सनातन सम्बन्ध को भुला दिया है, इसलिए कष्ट भोग रहा हूँ | वैसे भी कृष्ण भगवान ने गीता में बताया है कि यह जगत दुखालय है | सारे कष्ट अज्ञान या हमारी अविद्या के कारण हैं | यदि भूमि के जीव को जल में डाल दिया जाए या जल के जीव को भूमि पर रहने के लिए मजबूर किया जाए तो वह हमेशा कष्ट में रहेगा | इसी प्रकार मैं इस भौतिक जगत में, जो एक कारागार के समान है, कष्ट भोग रहा हूँ |

५. मेरा नित्य कर्म क्या है ?
अपने आप को भगवान का दास समझ कर भगवान तथा उनके भक्तों की प्रेम-मयी सेवा तथा प्रह्लाद महाराज द्वारा बताई भक्ति विधि में किसी भी विधि में स्थित हो कर कृष्णभावनामृत को ग्रहण करना | भगवान केवल अनन्य भक्ति के द्वारा ही जाने जा सकते व प्राप्त किये जा सकते हैं | केवल ऐसी भक्ति ही मेरा नित्य कर्म है | तथा इस वर्तमान बद्ध जीवन में अर्जित विशेष स्वाभाव के अनुसार अपने शरीर, मन, इन्द्रिय, बुद्धि या चेतना से जो कुछ भी करूँ, उसे केवल भगवान की प्रसन्नता के लिए ही करूँ |

6. जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा व रोग जैसे कष्टो से छुटकारा पाने अर्थात अमरता का स्थाई समाधान क्या है ?
भगवान के पवित्र नाम (हरे कृष्ण महामंत्र ) का प्रेम-पूर्ण कीर्तन व श्रवण, उनके रूप, गुण व लीला का लगातार चिंतन | अपने सारे नियत कर्मो को स्वामित्व व अहंकार की भावना से रहित होकर भगवान श्री कृष्ण की प्रसन्नता के लिए करना तथा समस्त कर्मफलों को भगवान कृष्ण की सेवा में समर्पित करना | भगवान श्री कृष्ण व उनके शुद्ध भक्तों की प्रेमपूर्ण सेवा | इन भक्तियुक्त कर्मों को सम्पूर्ण करके जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा व रोग जैसे कष्टो से छुटकारा पा कर इसी मानव जीवन में हम जीवन की सर्वोच्च सिद्धि भगवत्प्रेम पा सकते हैं और भगवद्-धाम वापस जा सकते हैं अर्थात मृत्यु पर विजय पा सकते हैं | हमें फिर से माता के गर्भ में न जाना पड़ेगा | भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है “इस जगत में सर्वोच्च लोक से लेकर निम्नतम सारे लोक दुखों के घर हैं जहाँ जन्म तथा मृत्यु का चक्कर लगा रहता है, किन्तु जो मेरे धाम को प्राप्त कर लेता है वह फिर कभी जन्म नहीं लेता”

हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे !
हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे !

Tuesday, 5 February 2019

आज का सबसे अच्छा संदेश

एक विदेशी ने गोपी चंदन खरीदा और 10 रुपये का भुगतान करने के बाद, दुकानदार के लड़के से पूछा, समाप्ति की तारीख क्या है?
लड़के ने ठंडा जवाब दिया, इसकी कोई एक्सपायरी डेट नहीं है, बल्कि रोजाना माथे पर लगाऐं यह आपकी एक्सपायरी डेट बढ़ा देता है।

प्रभुकृपा का अर्थ यह नहीं, कि जीवन में कभी दुःख ही न आए।


हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे

प्रभुकृपा का अर्थ यह नहीं,
कि जीवन में कभी दुःख ही न आए।

दुःख में भी आप दुखी न हों,
वो घड़ी कब बीत जाए,
आप को पता ही न चले...
यही है  "प्रभुकृपा"।

जिसके हरी हैं सारथि, निश्चय उसकी जीत,जिस मन हरी बसें, उस मन प्रीत ही प्रीत.

संत, महापुरुष, भगवत भक्तगण बताते हैं; कि जब आप बस या ट्रेन में बिना टिकट सफर करते हो तो कितना डर,भय, चिंता, घबराहट होती है । कहीं कोई टिकट चेक करने वाला ना आ जाये। सारा सफ़र चिंता और बेचैनी में जाता है ।

             और जो टिकट ले के सफ़र करता है ।

 वो खुशी-खुशी सफर करता है ।
           उसे कोई चिंता, घबराहट या परेशानी नही होती। उसका सफर खुशी-खुशी कट जाता है।
     
आखिर यह टिकट क्या है?

टिकट है; हरे कृष्णानाम !

         इस देहः में जो हरे-कृषंणानाम वाली टिकट लेके जीवन जीता है वो खुशी-खुशी जी लेता है ।

जो बिना हरिनाम के जीवन व्यतीत करता है उस व्यक्ति का सारा जीवन चिंता, घबराहट, बेचैनी और परेशानीयों से ही कटता है ।

इसीलिए संत महापुरुष कहते हैं-:
इक नाम सतगुरु कोलो मांग लै..
फिर तैनु कुछ मंगन दी लोड ही नई पैनी !

जप लो, यही मौका है.

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे

आंनद पाओगे वरना अंत काल पछताओगे

भगवान जगन्नाथ जी की रथयात्रा !!

पुर्व भारत उड़ीसा राज्य का पुरी क्षेत्र जिसे पुरुषोत्तम पुरी, शंख क्षेत्र, श्रीक्षेत्र के नाम से भी जाना जाता है, भगवान श्री जगन्नाथ जी की मुख्य लीला-भूमि है।

पूर्ण परात्पर भगवान श्री जगन्नाथ जी की रथयात्रा आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को जगन्नाथपुरी में आरंभ होती है। यह रथयात्रा पुरी का प्रधान पर्व भी है।
इसमें भाग लेने के लिए, इसके दर्शन लाभ के लिए हज़ारों, लाखों की संख्या में बाल, वृद्ध, युवा, नारी देश के सुदूर प्रांतों से आते हैं।
रथयात्रा में सबसे आगे ताल ध्वज पर श्री बलराम, उसके पीछे पद्म ध्वज रथ पर माता सुभद्रा व सुदर्शन चक्र और अंत में गरुण ध्वज पर या नंदीघोष नाम के रथ पर भगवान श्री जगन्नाथ जी सबसे पीछे चलते हैं।

तालध्वज रथ ६५ फीट लंबा, ६५ फीट चौड़ा और ४५ फीट ऊँचा है। इसमें ७ फीट व्यास के १७ पहिये लगे हैं।
बलभद्र जी का रथ तालध्वज और सुभद्रा जी का रथ को देवलन, जगन्नाथ जी के रथ से कुछ छोटे हैं। संध्या तक ये तीनों ही रथ मंदिर में जा पहुँचते हैं। अगले दिन भगवान रथ से उतर कर मंदिर में प्रवेश करते हैं और सात दिन वहीं रहते हैं। गुंडीचा मंदिर में इन नौ दिनों में श्री जगन्नाथ जी के दर्शन को आड़प-दर्शन कहा जाता है।
भगवान जगन्नाथ जी के प्रसाद को महाप्रसाद माना जाता है जबकि अन्य तीर्थों के प्रसाद को सामान्यतः प्रसाद ही कहा जाता है।

भगवान जगन्नाथ, बलदेव एवं माता सुभद्रा के अद्भुत स्वरूप का वर्णन...

श्री जगन्नाथ जी की रथयात्रा में भगवान श्री कृष्ण के साथ श्रीमती राधा या रुक्मिणी नहीं होतीं बल्कि श्रीबलराम और देवी सुभद्रा होते हैं।
श्री भगवान का ये लीला द्वारिका से सम्बंधित है । कुछ इस प्रकार है.

 द्वारिका में भगवान कृष्ण रुक्मिणी आदि राज महिषियों के साथ शयन करते हुए एक रात निद्रा में, अचानक श्री वृंदावन और भक्तमति गोपीयों का नाम लेने लगे। महारानियों को आश्चर्य हुआ। जागने पर भगवान श्रीकृष्ण ने अपना मनोभाव प्रकट नहीं होने दिया, लेकिन रुक्मिणी ने अन्य रानियों से वार्ता की कि, सुनते हैं वृंदावन में श्री राधा नाम की गोपकुमारी है जिसको प्रभु ने हम सबकी इतनी सेवा निष्ठा भक्ति के बाद भी नहीं भुलाया है।
श्रीमती राधा जी की भगवान श्रीकृष्ण के साथ रहस्यात्मक रास लीलाओं के बारे में माता रोहिणी भली प्रकार जानती थीं। उनसे जानकारी प्राप्त करने के लिए सभी महारानियों ने अनुनय-विनय की। पहले तो माता रोहिणी ने टालना चाहा लेकिन महारानियों के हठ करने पर कहा, ठीक है। सुनो, सुभद्रा को पहले पहरे पर बिठा दो, कोई अंदर न आने पाए, भले ही बलराम या श्रीकृष्ण ही क्यों न हों।

माता रोहिणी के श्री भगवान के वृंदावन लीला कथामृत शुरू करते ही श्री कृष्ण और बलरम अचानक अंत:पुर की ओर आते दिखाई दिए। सुभद्रा ने उचित कारण बता कर द्वार पर ही रोक लिया। अंत:पुर से श्रीकृष्ण और राधा की रासलीला की वार्ता श्रीकृष्ण और बलराम दोनो को ही सुनाई दी। उसको सुनने से श्रीकृष्ण और बलराम के अंग अंग में अद्भुत प्रेम रस का उद्भव होने लगा। साथ ही सुभद्रा भी भाव विह्वल होने लगीं। तीनों की ही ऐसी अवस्था हो गई कि पूरे ध्यान से देखने पर भी किसी के भी हाथ-पैर आदि स्पष्ट नहीं दिखते थे। भगवान का सुदर्शन चक्र विगलित हो गया। उसने लंबा-सा आकार ग्रहण कर लिया।
यह भगवान की आन्तरंग शक्ति, गोपीश्रेष्ठ भक्तिमती, माता राधिका के महाभाव का गौरवपूर्ण दृश्य था।

अचानक नारद के आगमन से वे तीनों पूर्ववत हो गए। नारद ने ही श्री भगवान से प्रार्थना की कि हे भगवान आप चारों के जिस महाभाव में लीन मूर्तिस्थ रूप के मैंने दर्शन किए हैं, वह सामान्य जनों के दर्शन हेतु पृथ्वी पर सदैव सुशोभित रहे। श्रीभगवान ने तथास्तु कह दिया।

स्वप्न में आदेशानुसार राजा इंद्रद्युम्न, जो सपरिवार नीलांचल सागर (उड़ीसा) के पास रहते थे, को समुद्र में एक विशालकाय काष्ठ दिखा। राजा के उससे कृष्ण मूर्ति का निर्माण कराने का निश्चय करते ही, वृद्ध बढ़ई के रूप में विश्वकर्मा जी स्वयं प्रस्तुत हो गए। उन्होंने मूर्ति बनाने के लिए एक शर्त रखी कि मैं जिस घर में मूर्ति बनाऊँगा उसमें मूर्ति के पूर्णरूपेण बन जाने तक कोई न आए। राजा ने इसे मान लिया। आज जिस जगह पर भगवान श्रीजगन्नाथ जी का मंदिर है उसी के पास एक घर के अंदर वे मूर्ति निर्माण में लग गए। राजा के परिवारजनों को यह ज्ञात न था कि वह वृद्ध बढ़ई कौन है। कई दिन तक घर का द्वार बंद रहने पर महारानी ने सोचा कि बिना खाए-पिये वह बढ़ई कैसे काम कर सकेगा। अब तक वह जीवित भी होगा या हम मर गया होगा। महारानी ने महाराजा को अपनी सहज शंका से अवगत करवाया। महाराजा के द्वार खुलवाने पर वह वृद्ध बढ़ई कहीं नहीं मिला लेकिन उसके द्वारा अर्द्धनिर्मित श्री जगन्नाथ, सुभद्रा तथा बलराम की काष्ठ मूर्तियाँ वहाँ पर मिली।

महाराजा और महारानी दुखी हो उठे। लेकिन उसी क्षण दोनों ने आकाशवाणी सुनी, ‘व्यर्थ दु:खी मत हो, हम इसी रूप में रहना चाहते हैं मूर्तियों को द्रव्य आदि से पवित्र कर स्थापित करवा दो।’ आज भी वे अपूर्ण और अस्पष्ट विग्रह पुरुषोत्तम पुरी की रथयात्रा और मंदिर में सुशोभित व प्रतिष्ठित हैं।
भगवान जगन्नाथ की जय  !

क्यों पड़ते है श्री जगन्नाथ भगवान प्रत्येक वर्ष बीमार.?
उड़ीसा प्रान्त में जगन्नाथ पूरी में एक भक्त रहते थे , श्री माधव दास जी  अकेले रहते थे, कोई संसार से इनका लेना देना नही।

अकेले बैठे बैठे भजन किया करते थे, नित्य प्रति श्री जगन्नाथ प्रभु का दर्शन करते थे और उन्ही को अपना सखा मानते थे, प्रभु के साथ खेलते थे।

प्रभु इनके साथ अनेक लीलाए किया करते थे | प्रभु इनको चोरी करना भी सिखाते थे भक्त माधव दास जी अपनी मस्ती में मग्न रहते थे |

एक बार माधव दास जी को अतिसार( उलटी – दस्त ) का रोग हो गया। वह इतने दुर्बल हो गए कि उठ-बैठ नहीं सकते थे, पर जब तक इनसे बना ये अपना कार्य स्वयं करते थे और सेवा किसी से लेते भी नही थे।

कोई कहे महाराजजी हम कर दे आपकी सेवा तो कहते नही मेरे तो एक जगन्नाथ ही है वही मेरी रक्षा करेंगे । ऐसी दशा में जब उनका रोग बढ़ गया वो उठने बेठने में भी असमर्थ हो गये ,

तब श्री जगन्नाथजी स्वयं सेवक बनकर इनके घर पहुचे और माधवदासजी को कहा की हम आपकी सेवा कर दे।

भक्तो के लिए अपने क्या क्या नही किया…
क्यूंकि उनका इतना रोग बढ़ गया था की उन्हें पता भी नही चलता था की कब मल मूत्र त्याग देते थे। वस्त्र गंदे हो जाते थे।

उन वस्त्रो को जगन्नाथ भगवान अपने हाथो से साफ करते थे, उनके पुरे शरीर को साफ करते थे, उनको स्वच्छ करते थे।

कोई अपना भी इतनी सेवा नही कर सके, जितनी जगन्नाथ भगवान ने भक्त माधव दास जी की करी है।

भक्त माधव दास जी पर प्रभु का स्नेह.

जब माधवदासजी को होश आया,तब उन्होंने तुरंत पहचान लीया की यह तो मेरे प्रभु ही हैं।
एक दिन श्री माधवदासजी ने पूछ लिया प्रभु से –

प्रभु आप तो त्रिभुवन के मालिक हो, स्वामी हो, आप मेरी सेवा कर रहे हो आप चाहते तो मेरा ये रोग भी तो दूर कर सकते थे, रोग दूर कर देते तो ये सब करना नही पड़ता”

ठाकुरजी कहते हा देखो माधव! मुझसे भक्तों का कष्ट नहीं सहा जाता,इसी कारण तुम्हारी सेवा मैंने स्वयं की। जो प्रारब्द्ध होता है उसे तो भोगना ही पड़ता है।

अगर उसको काटोगे तो इस जन्म में नही पर उसको भोगने के लिए फिर तुम्हे अगला जन्म लेना पड़ेगा और मै नही चाहता की मेरे भक्त को ज़रा से प्रारब्द्ध के कारण अगला जन्म फिर लेना पड़े,

 इसीलिए मैंने तुम्हारी सेवा की लेकिन अगर फिर भी तुम कह रहे हो तो भक्त की बात भी नही टाल सकता

भक्तो के सहायक बन उनको प्रारब्द्ध के दुखो से, कष्टों से सहज ही पार कर देते है प्रभु
अब तुम्हारे प्रारब्द्ध में ये 15 दिन का रोग और बचा है, इसलिए 15 दिन का रोग तू मुझे दे दे
15 दिन का वो रोग जगन्नाथ प्रभु ने माधवदास जी से ले लिया

आज भी इसलिए जगन्नाथ भगवान होते है बीमार.

वो तो हो गयी तब की बात पर भक्त वत्सलता देखो आज भी वर्ष में एक बार जगन्नाथ भगवान को स्नान कराया जाता है ( जिसे स्नान यात्रा कहते है )

स्नान यात्रा करने के बाद हर साल 15 दिन के लिए जगन्नाथ भगवान आज भी बीमार पड़ते है।

15 दिन के लिए मंदिर बंद कर दिया जाता है  कभी भी जगनाथ भगवान की रसोई बंद नही होती पर इन 15 दिन के लिए उनकी रसोई बंद कर दी जाती है।

 भगवान को 56 भोग नही खिलाया जाता , ( बीमार हो तो परहेज़ तो रखना पड़ेगा )

प्रभु को लगाया जाता है काढ़ो का भोग.........

15 दिन जगन्नाथ भगवान को काढ़ो का भोग लगता है | इस दौरान भगवान को आयुर्वेदिक काढ़े का भोग लगाया जाता है। जगन्नाथ धाम मंदिर में तो भगवान की बीमारी की जांच करने के लिए हर दिन वैद्य भी आते हैं।

काढ़े के अलावा फलों का रस भी दिया जाता है। वहीं रोज शीतल लेप भी लगया जाता है। बीमार के दौरान उन्हें फलों का रस, छेना का भोग लगाया जाता है और रात में सोने से पहले मीठा दूध अर्पित किया जाता है।

भगवान जगन्नाथ बीमार हो गए है और अब 15दिनों तक आराम करेंगे। आराम के लिए 15 दिन तक मंदिरों पट भी बंद कर दिए जाते है और उनकी सेवा की जाती है। ताकि वे जल्दी ठीक हो जाएं।

जिस दिन वे पूरी तरह से ठीक होते है उस दिन जगन्नाथ यात्रा निकलती है, जिसके दर्शन हेतु असंख्य भक्त उमड़ते है।

खुद पे तकलीफ ले कर अपने भक्तो का जीवन सुखमयी बनाये। ऐसे तो सिर्फ मेरे भगवान ही हो सकते है ।।

जय हो प्रभुपाद
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे
हरे कृष्ण दंडवत प्रणाम और नमस्कार हरे कृष्ण

Monday, 28 January 2019

मृत्यु से भय कैसा

💙मृत्यु से भय कैसा  💙

राजा परीक्षित को श्रीमद्भागवत पुराण सुनातें हुए
जब शुकदेव जी महाराज को छह दिन बीत गए और
तक्षक ( सर्प ) के काटने से मृत्यु होने का एक दिन शेष
रह गया, तब भी राजा परीक्षित का शोक और मृत्यु
का भय दूर नहीं हुआ।
.
.
अपने मरने की घड़ी निकट आती देखकर राजा का मन क्षुब्ध हो रहा था। तब शुकदेव जी महाराज ने परीक्षित को एक कथा सुनानी आरंभ की।
.राजन ! बहुत समय पहले की बात है, एक राजा किसी जंगल में शिकार खेलने गया।
.
संयोगवश वह रास्ता भूलकर बड़े घने जंगल में जा
पहुँचा। उसे रास्ता ढूंढते-ढूंढते रात्रि पड़ गई और भारी
वर्षा पड़ने लगी। जंगल में सिंह व्याघ्र आदि बोलने लगे। वह राजा बहुत डर गया और किसी प्रकार उस भयानक जंगल में रात्रि बिताने के लिए विश्राम का स्थान ढूंढने लगा।
.रात के समय में अंधेरा होने की वजह से उसे एक दीपक दिखाई दिया। वहाँ पहुँचकर उसने एक गंदे बहेलिये की झोंपड़ी देखी ।
वह बहेलिया ज्यादा चल-फिर नहीं सकता था,
इसलिए झोंपड़ी में ही एक ओर उसने मल-मूत्र त्यागने
का स्थान बना रखा था।
अपने खाने के लिए जानवरों का मांस उसने झोंपड़ी
की छत पर लटका रखा था। बड़ी गंदी, छोटी, अंधेरी
और दुर्गंधयुक्त वह झोंपड़ी थी।
.उस झोंपड़ी को देखकर पहले तो राजा ठिठका,
लेकिन पीछे उसने सिर छिपाने का कोई और आश्रय न
देखकर उस बहेलिये से अपनी झोंपड़ी में रात भर ठहर जाने देने के लिए प्रार्थना की।
.बहेलिये ने कहा कि आश्रय के लोभी राहगीर कभी-
कभी यहाँ आ भटकते हैं। मैं उन्हें ठहरा तो लेता हूँ,
लेकिन दूसरे दिन जाते समय वे बहुत झंझट करते हैं।
.इस झोंपड़ी की गंध उन्हें ऐसी भा जाती है कि फिर
वे उसे छोड़ना ही नहीं चाहते और इसी में ही रहने
की कोशिश करते हैं एवं अपना कब्जा जमाते हैं। ऐसे
झंझट में मैं कई बार पड़ चुका हूँ।।
.इसलिए मैं अब किसी को भी यहां नहीं ठहरने देता।
मैं आपको भी इसमें नहीं ठहरने दूंगा।
.राजा ने प्रतिज्ञा की कि वह सुबह होते ही इस
झोंपड़ी को अवश्य खाली कर देगा। उसका काम तो
बहुत बड़ा है, यहाँ तो वह संयोगवश भटकते हुए आया है सिर्फ एक रात्रि ही काटनी है।
.बहेलिये ने राजा को ठहरने की अनुमति दे दी, पर सुबह होते ही बिना कोई झंझट किए झोंपड़ी खाली कर देने की शर्त को फिर दोहरा दिया।
.राजा रात भर एक कोने में पड़ा सोता रहा। सोने में
झोंपड़ी की दुर्गंध उसके मस्तिष्क में ऐसी बस गई कि
सुबह उठा तो वही सब परमप्रिय लगने लगा। अपने
जीवन के वास्तविक उद्देश्य को भूलकर वहीं निवास
करने की बात सोचने लगा।
.वह बहेलिये से और ठहरने की प्रार्थना करने लगा। इस पर बहेलिया भड़क गया और राजा को भला-बुरा
कहने लगा।
.राजा को अब वह जगह छोड़ना झंझट लगने लगा और दोनों के बीच उस स्थान को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया।
.कथा सुनाकर शुकदेव जी महाराज ने परीक्षित से
पूछा," परीक्षित ! बताओ, उस राजा का उस स्थान
पर सदा के लिए रहने के लिए झंझट करना उचित था ?
"परीक्षित ने उत्तर दिया," भगवन् ! वह कौन राजा
था, उसका नाम तो बताइये ? वह तो बड़ा भारी
मूर्ख जान पड़ता है, जो ऐसी गंदी झोंपड़ी में, अपनी
प्रतिज्ञा तोड़कर एवं अपना वास्तविक उद्देश्य
भूलकर, नियत अवधि से भी अधिक रहना चाहता है।
उसकी मूर्खता पर तो मुझे आश्चर्य होता है। "
श्री शुकदेव जी महाराज ने कहा," हे राजा
परीक्षित ! वह बड़े भारी मूर्ख तो स्वयं आप ही हैं।
इस मल-मूल की गठरी देह ( शरीर ) में जितने समय
आपकी आत्मा को रहना आवश्यक था, वह अवधि
तो कल समाप्त हो रही है। अब आपको उस लोक
जाना है, जहाँ से आप आएं हैं। फिर भी आप झंझट
फैला रहे हैं और मरना नहीं चाहते। क्या यह आपकी
मूर्खता नहीं है ?"
.राजा परीक्षित का ज्ञान जाग पड़ा और वे बंधन
मुक्ति के लिए सहर्ष तैयार हो गए।

. वास्तव में यही सत्य है।
.जब एक जीव अपनी माँ की कोख से जन्म लेता है तो
अपनी माँ की कोख के अन्दर भगवान से प्रार्थना
करता है कि हे भगवन् ! मुझे यहाँ ( इस कोख ) से मुक्त कीजिए, मैं आपका भजन-सुमिरन करूँगा।
.और जब वह जन्म लेकर इस संसार में आता है तो ( उस राजा की तरह हैरान होकर ) सोचने लगता है कि मैं ये कहाँ आ गया ( और पैदा होते ही रोने लगता है )
फिर उस गंध से भरी झोंपड़ी की तरह उसे यहाँ की
खुशबू ऐसी भा जाती है कि वह अपना वास्तविक
उद्देश्य भूलकर यहाँ से जाना ही नहीं चाहता है।

.यही मेरी भी कथा है और आपकी भी, इसलिये हमे समय रहते भजन सिमरन पर पूरा समय देना चाहिये !

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